मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

(ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है                                                 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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मैं इस बात को समझ ही नहीं पा रही हूँ कि हम कितने सारे समयों को एक साथ जी लेते हैं, न जाने कितने संसार, ना जाने कितने समय। या फिर जी भी पा रहे हैं अपने समय को?
अभी कुछ दिन पहले अक्षय तृतीया आई तो टी वी के सारे चैनल सोने से भरी दूकाने दिखाते रहे, सोने की खरीद के जो आँकड़े उन्होंने दिए, वे इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि हम बेहद अमीरी की और बढ़ रहे हैं। क्यों कि मुझे तो याद नहीं कि मेरी माँ अक्षय तृतीया को सोने की दूकान पर गई, हाँ वे इस दिन दान जरूर करती थीं।
 गुजरात के गाँवों की तस्वीर  जहाँ एक एक बालटी के लिए मारधाड़ हो रही है, रंगत उड़े चेहरे लिए औरते बच्चे बस पानी के लिए घण्टों टकटकी लगाए बैठे रहते हैं, जो सरकार द्वारा उन्हें दो दिन में एक बार मुहैय्या करवाया जाता है। जिसके आते ही लोगों में छीना झपटी शुरु हो जाती है
पानी और सोना
एक प्यास बुझाता है तो दूसरी बढ़ाता है
हम इतने अमीर है कि सोने से लदे जा रहे हैं
हम इतने गरीब है कि गले की प्यास भी नहीं बुझा पा रहे हैं

रति सक्सेना

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‘वह देखो अरुंधति !'

मां की श्वासनली में कैंसर था और वह मर गई थी इसके बाद

उसकी उंगली उठी रह गई थी आकाश की ओर
उदय प्रकाश
*
तलवारें
बताती रहीं पानी
राजसिंहासन
पानीदार के हाथ ही
रहता रहा तब तक।

अब जब जाना
पानी वह नहीं था
दम्भ था निरा
बंट चुका था
दुनिया भर का पानी
नहीं बंटी
हमारी अपनी थी
आज भी थिर है
थार में प्यास।
ओम पुरोहित ‘कागद
*
भले किसी और की हो जाएं
ये गहरी काली आंखें
वे सितारे मेरी स्मृति के अलाव में
रह-रह कर चमकते रहेंगे जो
उस छोटी-सी मुलाकात में
चमके थे तुम्हारी आंखों में
प्रियंकर पालीवाल
*

दरबार में
सभासदों के बीच,
सिर्फ असमंजस ही नहीं
बड़ा असमंजस है.
अशोक गुप्ता

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1
इस सुंदर लुभावने समय में
तुम्हारी स्मृति पहाड सी हो गई है
जैसे तुम्हारी नाराजगी होती हो कभी
मुझ पर
यह पुरानी बात है अब कि
जिंदगी को कविता की तरह सुंदर होना चाहिए,
अब होना चाहिए
सुंदर और प्यारा
कविता को तुम्हारी स्मृति सा।
2
इस सुदूर देश में
जहां हम कभी साथ नहीं रहे, आए या हुए

क्यों तुम्हारी स्मृति कौंधती है
और तुम्हारे वजूद से धरती को
सराबोर करती है
मैं ना चाहूं तब भी
प्रेम इलहाम है
इलहाम ही है प्रेम
तो फिर समय और देष की दूरियां भी
इलहामी ही हैं क्या मेरे प्रिय!

3
टीपू ने मुझे नहीं बुलाया
टीपू ने मुझे अकेले नहीं बुलाया
टीपू ने तुम्हें नहीं बुलाया
मेरा आना
और तुम्हारा ना आना
ना होना
इसमें टीपू की भूमिका तीन शताब्दियों बाद
क्या संभव थी!
दुष्यन्त
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बसन्त में फूल खिलते हैं
उनकी सुन्दरता और सुगन्ध की
फूलों में अदला- बदली होती है।
वे एक दूसरे को रिझाती हैं।
बसन्त के गर्माहट भरे घूँघट में
झपकी ले कर खिले फूलों के संग हौले-हौले
झूम-झूम कर वन्य हरितिमा
शोभा बढ़ाती है...

हेमन्त के बीतने पर
आता है शिशिर
ये फूल, यह हरियाली
लजाए बिना मुरझा जाते हैं
झर जाते है लजाये बिना ही
हालाँकि लिखा जाता है इनके बारे में हरदम
बसन्त और ग्रीष्म ऋतुएँ नहीं होती हैं हमारी
लगता है हम मरुभूमि पर आबाद हैं शायद
मरुभूमि पर चलने वाले तूफान तथा आँधी
उड़ाकर लाए, बालू के कण हमारी आँखों मे
लगे घुसने...
मैं अपनी डफली जोर-जोर से बजाता हूँ
तुम अपनी डफली और जोर से बजाने लगते हो
तुमने मेरी डफली की धुन सुनी
मुझे तुम पर शंका होती है
लेकिन क्या मैं तुम्हारी डफली की धुन नहीं सुन रहा?
मैं, बेशरमी में भूल ही जाता हूँ।
गिर्मी सेर्पा
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आ गई पावस प्रिये लो!
मत्त कुञ्जर सदृश जलधर नव्य सीकर से रिझाता
वज्रनाद कठोर कर कर राव मर्दल बजाता
कामिजन प्रियक्रान्ति उत्तम धार कर निज नवलतन में
उड़ा विद्युत की पताका राजवत् आया गगन में
सतत डम्बर भीम अम्बर
*
नील इन्दीवर मधुर की क्रान्तिवाले श्याम जलधर
प्रभिन्नाञ्जनराशि से स्तर स्तर जमे अतिपीन होकर
गर्भिणी के स्तनाग्रों की श्याम प्रभले छा दिगम्बर
व्योम में उमड़े घुमड़कर, आ गई पावस प्रिये लो!
*
चातकों के कुल तृषाकुल याचना करते सतत ही
तोय अवलम्बन जलद कर श्रुति मढ़ुर ध्वनि अति सुभगरा
खण्ड शतशत धार झर झर मंद मंद मधुर गमन कर,
प्राणधन आल्हाद सीकर, आ गई पावस प्रिये लो!
*
लो कि अब भीमवेगा पंकिल नदियाँ हुमकतीं
तीर तरुओं को गिराती वासना से हैं उमंगती
सिंधु का धर ध्यान, रत रति ध्यान में अब भागती हैं
दूर तक फैली हुई लहरें सभी को लांघती है
मत्त प्रावट् है उठा कर, आ गई पावस प्रिये लो!
ऋतु संहार से पावस
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VOL - V/issue XII

(जून-  2010
)

संपादक :  रति सक्सेना


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