कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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मैं इस बात को समझ ही नहीं पा रही हूँ कि हम कितने सारे समयों को एक साथ जी लेते हैं, न जाने कितने संसार, ना जाने कितने समय। या फिर जी भी पा रहे हैं अपने समय को?
अभी कुछ दिन पहले अक्षय तृतीया आई तो टी वी के सारे चैनल सोने से भरी दूकाने दिखाते रहे, सोने की खरीद के जो आँकड़े उन्होंने दिए, वे इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि हम बेहद अमीरी की और बढ़ रहे हैं। क्यों कि मुझे तो याद नहीं कि मेरी माँ अक्षय तृतीया को सोने की दूकान पर गई, हाँ वे इस दिन दान जरूर करती थीं।
यहाँ केरल में तो मैं सोने की दूकान में जाने मे ही घबराती हूं, इतनी भीड़, कि मानों मुफ्त में बँट रहा हो सोना

सोने की दूकान के बाद अधिकतर सभी समाचार चैनलों के दृश्य गुजरात , राजस्थान जैसे सूखे से जूझते प्रदेश दिखाने लगते हैं। गुजरात के गाँवों की तस्वीर दिखाई जाती है, जहाँ एक एक बालटी के लिए मारधाड़ हो रही है, रंगत उड़े चेहरे लिए औरते बच्चे बस पानी के लिए घण्टों टकटकी लगाए बैठे रहते हैं, जो सरकार द्वारा उन्हें दो दिन में एक बार मुहैय्या करवाया जाता है। जिसके आते ही लोगों में छीना झपटी शुरु हो जाती है, जिसके पास ताकत है, वह भर लेजाता है, बाकी लोग सूनी आँखो से अगले टैंक का इंतजार करते हैं।

पानी और सोना
एक प्यास बुझाता है तो दूसरी बढ़ाता है
हम इतने अमीर है कि सोने से लदे जा रहे हैं
हम इतने गरीब है कि गले की प्यास भी नहीं बुझा पा रहे हैं

मुझे वियेना के म्यूजियम की याद आती है, गाइड ने एक चित्र की और इशारा किया जिसमें एक बन्दर किसी आदमी के सिर से जुए बीन रहा था। वह बताने लगी कि उन दिनों यहाँ पानी की बेहद किल्लत थी, नहाने के लिए पानी ही नहीं होता तो लोगों के सिर पे जुएं पड़ जाते थे, तो कुछ बन्दर पालने वाले लोगों के सिरों से जुए बिनवाने का काम भी करते थे। जिस लहजे में गाइड ने बात की थी, वह बड़ा मजाकिया था, इसलिए में पीछे की कथा नहीं जानती, लेकिन यह जरूर है कि इस वक्त वियेना झीलों से अटा पड़ा है, शहर के किसी कोने में जाओं , किसी ना किसी झील का अक्स दिखाई देता है। और हम, सिन्धु सरस्वती की संस्कृति वाले जन बून्द को तरस रहे हैं।

सबसे बड़े आश्चर्य की बात है कि इस भयंकर असमानता वाले समय में हमारे पास कोई मुद्दा ही नहीं?

न लेखन के लिए, ना ही कर्तव्य के लिए।

कितना लिप्त हो गए हैं हम लोग अपने आप में?

पूरे पाँच साल से कृत्या हर महिने कुछ कविताओं को, को विचारों और मुद्दों को लेकर आती रही है, सच कोई तीर नहीं मार रही, कविता से आन्दोलन नहीं होते, लेकिन आन्दोलनों को शब्द तो मिल जाते हैं।
हम इस अकविता के समय में बेहद लिख रहे हैं, काफी कुछ सोने जैसा है, जो चमकदार है लेकिन समय की अंधेरी तिजोरी में बन्द हो जाने वाला लेकिन बहुत कम ऐसा है जो पानी सा बहुमूल्य है, बुल्लै शाह की आवाज सा पानीदार।

फिर भी हम लिख रहे हैं, इतना काफी नहीं?
नहीं लिख पा रहे हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं!

मित्रों , पाँच बरस में पहली बार हिन्दी वाले अंक के लिए सभी कविताएँ नेट पर मिली है, इसे मैं बेहद महत्वपूर्ण मान रही हूँ।

इस अंक के कलाकार हैं:  Henry Avignon and Aksha Ameriya.

शुभकामना सहित

रति सक्सेना



 
     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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