कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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दुष्यन्त की लम्बी कविता, कृत्या उत्सव के दौरान और उसके पश्चात लिखी है, इन कविताओं में ना केवल कविता बल्कि इतिहास को कविता से जोड़ा गया है। इसी कारण इसे हमने कविता को तलाशती कविता के रूप में चुना है।

टीपू के शहर में प्रेम


1
इस सुंदर लुभावने समय में
तुम्हारी स्मृति पहाड सी हो गई है
जैसे तुम्हारी नाराजगी होती हो कभी
मुझ पर
यह पुरानी बात है अब कि
जिंदगी को कविता की तरह सुंदर होना चाहिए,
अब होना चाहिए
सुंदर और प्यारा
कविता को तुम्हारी स्मृति सा।

2
इस सुदूर देश में
जहां हम कभी साथ नहीं रहे, आए या हुए

क्यों तुम्हारी स्मृति कौंधती है
और तुम्हारे वजूद से धरती को
सराबोर करती है
मैं ना चाहूं तब भी
प्रेम इलहाम है
इलहाम ही है प्रेम
तो फिर समय और देष की दूरियां भी
इलहामी ही हैं क्या मेरे प्रिय!

3
टीपू ने मुझे नहीं बुलाया
टीपू ने मुझे अकेले नहीं बुलाया
टीपू ने तुम्हें नहीं बुलाया
मेरा आना
और तुम्हारा ना आना
ना होना
इसमें टीपू की भूमिका तीन शताब्दियों बाद
क्या संभव थी!
अंग्रेजों से लडते हुए मरा वह वीर यौद्धा
भूत तो नहीं बन सकता था
देवता तो बन ही सकता था
हमें साथ बुलाकर अपने इस शहर में।

मैसूर 3-2-2010

मुझे क्षमा करें
(प्रथम इतिहास शिक्षक राजेंद्र धूपड के लिए )

इतिहास अब मुश्किल से ही पढ पाता हूं कभी
और इतिहास पढाना तो कब का छूट चुका
इतिहास हो चुका
मैं भी इतिहास होते-होते बचा हूं
पर इतिहास अब भी रगों में है मेरी
इतिहास दुनिया का
इतिहास हिंदुस्तान का
इतिहास मेरे परिवार का
इतिहास मेरे स्कूल का
और छोटा सा इतिहास मेरा भी
मेरे उस प्रेम का इतिहास
प्रेम नहीं है,
प्रेमिका है कहीं है और पढाती है इतिहास।
कहते हैं कि इतिहास माफ नहीं करता किसी को
मुझे भी नहीं करेगा फिर तो
ना कि मेरे विस्थापन को
पेट और सपनों के लिए मेरे विस्थापन को
विस्थापन अपनी जमीन से,
अपनी जुबान से
और अपने लोगों से
पर आत्म विस्थापन का इतिहास गौरवपूर्ण हो सकता है क्या!
पर गौरवपूर्ण इतिहास हमारे आज को बेहतर और आने वाले कल को तो
गौरवपूर्ण नहीं बना सकते ना!

भूले हुए इतिहास
(प्रथम इतिहास शिक्षक राजेंद्र धूपड के लिए )

टीपू सुल्तान के इस शहर में
आपको याद करते हुए
कि उससे पहला परिचय आपने ही करवाया था
उस परिचय के लगभग डेढ दषक से अधिक समय बाद
टीपू के शहर में मेरे कदम ठिठकते हैं
कि मैं इतिहास भूल रहा हूं
इतिहास में खोने के लिए
या इतिहास बनने के लिए।

इलहाम
(डॉ रति सक्सेना के लिए)

इतनी सुंदर कविता रची है आपने कि
कविता से अपने मोहभंग पर
पुनर्विचार को विवश होते हुए
पूछ रहा हूं -
इस काव्य नदी का स्रोत कहां है!

कविता जब यूं बनती है जिंदगी तो
जिंदगी के इर्द-गिर्द के तमाम स्याह अंधेरे
उजालों में बदलना शुरू हो जाते हैं यकीनन
और लगता है कि
अगली सुबह का सूरज
एक कविता होगा!

मैसूर 5.2.2010

एक भाषा हुआ करती थी

(मैसूर काव्योत्सव से लौटकर )

वहां हर कोई
अपनी जुबान के हवाले से कर रहा था बात
स्पेनिश, हिब्रू, हिंदी, वियतनामी,जर्मन आदि आदि
हालांकि मैं हिंदी में लिखता हूं और मुझे हिंदी से प्रेम है
पर मेरी जुबान- अपनी जुबान तो
राजस्थानी है
जो विस्थापित है अनंत में
बिना जमीन के है अपने ही देश में
जैसे कश्मीर के कवि है अग्निशेखर अपने ही देश में
जिनसे 'छीन ली गई है उनकी ही नदी'
और मुझसे मेरी ही भाषा अपने ही देश में
इस कदर कि उसमें लिख नहीं सकता
प्रेम दर्द और खुशी के गीत
मुझे हिंदी से अनंत प्रेम है
और अंग्रेजी की जरूरत को समझता हूं मैं
और करता हूं सम्मान दुनिया की हर भाषा का
पर मेरी अपनी जुबान का क्या!
जो रह ना जाए कहीं केवल चंद किताबों में
कुछ कहावतों में
और लिखें लोग
उदयप्रकाश जी की कविता पुस्तक के शीर्षक का काल बदलकर
इस तरह-
'एक भाषा हुआ करती थी' !


10-2-2010 जयपुर
 


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