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ऋतु संहार से पावस ऋतु

तीक्ष्ण गर्मी ने सम्पूर्ण बारत में हाहाकार मचा रखा है। ऐसे में यहाँ केरल में पहली फुहार ने मुझे ग्रीष्म को भुला कर वर्षा ऋतु के बारे में सोचने को विवश कर दिया है। ऋतु संहार उन कृतियों में से जिसे जितनी बार पढ़ो, नयी ही लगती हैं। और यदि अनुवादक जैसे राघेय राघव जैसे साहित्य परखी हों तो आनन्द की कोई कमी नहीं रहती है।

प्रस्तुत हैं पावस ऋतु से कुछ अंश

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आ गई पावस प्रिये लो!
मत्त कुञ्जर सदृश जलधर नव्य सीकर से रिझाता
वज्रनाद कठोर कर कर राव मर्दल बजाता
कामिजन प्रियक्रान्ति उत्तम धार कर निज नवलतन में
उड़ा विद्युत की पताका राजवत् आया गगन में
सतत डम्बर भीम अम्बर
आ गई पावस प्रिये लो!

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नील इन्दीवरमधुर की क्रान्तिवाले श्याम जलधर
प्रभिन्नाञ्जनराशि से स्तर स्तर जमे अतिपीन होकर
गर्भिणी के स्तनाग्रों की श्याम प्रभले छा दिगम्बर
व्योम में उमड़े घुमड़कर, आ गई पावस प्रिये लो!

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चातकों के कुल तृषाकुल याचना करते सतत ही
तोय अवलम्बन जलद कर श्रुति मढ़ुर ध्वनि अति सुभगरा
खण्ड शतशत धार झर झर मंद मंद मधुर गमन कर,
प्राणधन आल्हाद सीकर, आ गई पावस प्रिये लो!

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लो कि अब भीमवेगा पंकिल नदियाँ हुमकतीं
तीर तरुओं को गिराती वासना से हैं उमंगती
सिंधु का धर ध्यान, रत रति ध्यान में अब भागती हैं
दुर तक फैली हुई लहरें सभी को लांघती है
मत्त प्रावट् है उठा कर, आ गई पावस प्रिये लो!

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जगे तृण, अंकुर नये फिर फूट आये हैं सिहर कर
नये कोंपल श्याम प्रिय द्रुमराजि पर शोभा खिला कर,
हरिणियों ने नील कोने खा लिए कोमल कुतर कर
पवन में भरती सुमर्मर, आ गई पावस प्रिये लो!

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चपल नेत्रोर्पल सुशोभित वर वदन वे भीत मृगदल
सैकतिनि पर घूमते हैं, हृदय उत्सुकता भरे चल
रम्य मुग्ध वनस्थली के हृदय को करता समुत्सुक
झूमता है भार जलधर, आ गई पावस प्रिये लो!

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वे नवल कमलाभ नीले घन उपल पर गिरते
सतत चुम्बन कर मधुर निर्झर निरन्तर स्रवित झरते
नृत्यरत होते कलापी विकल होते भीम भूधर
स्पर्श से तन में सिहर भर, आ गई पावस प्रिये लो!

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नितम्बो तक लहराते हैं घुंघरवाले चिकुर चंचल
पीन उन्नत स्तन स्फुरित हैं, वदन में मधुगंध विह्वल
कुसुम के गंधित सुरम अवंतस अपने गौर तन धर
कामियों में रति जगातीं योषिताएँ मन रिझा कर
रूप विद्युत जमगा कर, आ गई पावस प्रिये लो!

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नव सलिल से तापश्रान्त वनान्त हर्षित झूमता है
आज नव आनन्द फूट कदम्ब तरु पर झूलता है
पवन से शाखा विकंपित, प्रति कुसुम नव हर्ष आतुर
केतकी के रोम विकसे खिल उठा कान्तार हँस कर
नाचते हैं मोर मनोहर, आ गई पावस प्रिये लो!

 

 

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