उदय  प्रकाश

उदय प्रकाश समकालीन हिन्दी साहित्य में वह नाम है जो अपने समकाल से सभी हदों में जुड़े होते हुए , हिन्दी साहित्य का वैश्विक चेतना से सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक है। भाषाई गतिरोधों से ऊपर उठ कर आप साहित्य को बेहद समीचीन दृष्टि देनेमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


दो)

उसका चेहरा
हमारे आंसुओं की बाढ़ में
बार-बार उतराता है

उसके अनगिनत खरोंचों में से
हमारे अनगिनत घावों का लहू रिसता है

हमारे हिस्से की यातना ने
वर्षों से उसकी नींद छीन रखी है

हमारे बच्चों के लिए लोरियां खोजने
वह जिस जंगल की ओर गई है
वहां से जानवरों की आवाज आ रही हैं
उधर गोलियां चल रही हैं

उसकी बहुत बारीक और नाजुक
कांपती आवाज़ में हमारी भाषा नयी सदी की नयी लिपि
और व्याकरण सीखती है

सोन की रेत में वह पैरों के चिन्ह छोड़ गई है
नर्मदा की धार में उसका चेहरा
चुपचाप झिलमिलाता हुआ बहता है

तीन)

लुटियन के टीले से कभी नहीं दिखती अरुंधति
वहां अक्सर दिखता है पृथ्वी के निकट आता हुआ
अमंगलकारी रक्ताभ मंगल

या अंतरिक्ष में अपनी कक्षा से भटका कोई
गिरता हुआ टोही खुफि़या उपग्रह

रोहतक या मथुरा से देखो तो सूर्योदय के ठीक पहले
राजधानी के ऊपर हर रोज़ उगता है किसी गुंबद-सा
कोहरे का रहस्यपूर्ण रंगीन छाता
वर्णक्रम के सारे रंगों को किसी डरावनी आशंका में बदलता

संसद या केंद्रीय सचिवालय के आकाश में
नक्षत्र नहीं दिखते आजमा लो
न सात हल-नागर, न शुकवा, न धुरु, न गुरु
वहां तो चंद्रमा भी अपनी गहरी कलंकित झाइयों के साथ
किसी पीलिया के बीमार-सा उगता है महीने में कुछ गिनी-चुनी रात
नत्रजन, गंधक और कार्बन में बमुश्किल किसी तरह अपनी सांस खींचता

कभी-कभी आधीरात टीवी चैनल ज़रूर दिखाते हैं
टूटती उल्काओं की आतिशबाजी
किंग खान और माही के करिश्मों के बाद

दिल्ली से नहीं दिखता आकाश
यहां से नहीं दिखता हमारा गांव-देश, हमारे खाने की थाली,
हमारे कपड़े, हमारी बकरियां और बच्चे

दिल्ली से तो दादरी के खेत और निठारी की तंदूर तक नहीं दिखते

यहां के स्काइस्क्रैपर्स की चोटी पर खड़े होकर
गैलीलियो की दूरबीन से भी
लगभग असंभव है
अरुंधति की मद्धिम लाल
टिमटिमाती रोशनी को देख पाना।



(चार)

नोआखाली के समय मेरा जन्म नहीं हुआ था
मुझे नहीं पता चंपारण में निलहे बंधुआ मज़दूरों को
इंडिगो कंपनियों के गोरे मालिकों और उनके देशी मुसाहिबों ने
किस कैद में रखा
महीने में कितने रोज़ भूखा सुलाया
कितना सताया कितनी यातना दी
उन तारीखों के जो विद्वान आज हवाले देते फिरते हैं मेलों-त्यौहारों नें
उनके चेहरे संदिग्ध हैं
उनकी खुशहाली मशहूरियत और ताकत के तमाम किस्से आम हैं

मैं जब पैदा हुआ उसके पांच साल पहले से
प्राथमिक पाठाशाला में पढ़ाया जाता था कि मुल्क आजा़द है
कि इंसाफ़ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के
कि दे दी हमें आजा़दी बिना खडग बिना ढाल

मैंने रामलीलाओं से बाहर कभी खडग असलियत में नहीं देखे न ढाल
साबरमती आज नक्शे में किस जगह है इसे जानते हुए डर लगता है
रही आजा़दी तो मेरे समय में तो गुआंतानामो है अबुग़रेब है
जालियांवाला बाग नहीं जाफना है
चौरीचौरा नहीं अयोध्या और अमदाबाद है

और यहां से वहां तक फैली हुई तीन तरह की खामोशियां हैं

एक वह जिसके हाथ खून में लथ-पथ हैं
दूसरी वह जिसे अपनी मृत्यु का इंतज़ार है

तीसरी वह जो कुछ सोचते हुए
आकाश के उस नक्षत्र को देख रही है जहां से
कई लाख करोड़ प्रकाश वर्षों को पार करती हुई आ रही है कोई आवाज़

इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि किसी नदी या नक्षत्र
पवन या पहाड़ पेड़ या पखेरू पीर या फ़कीर की
भाषा क्या है ?
यह कविता इसी तरह लिखी जा रही है, अलग-अलग समय और मूड्स में। यह किसी सूची में शामिल होने के लिए नहीं, अपने समय की चिंता का हिस्सा बनने के लिए लिखी जा रही है। जीवन की अनिश्चितताओं और बिखरावों के बीच। यह किसी भाषा विशेष की अभिव्यक्ति या उसकी कला-परंपरा का अंग नहीं है। यकीन मानिए, अगर कोई अन्य भाषा मैं इतनी जानता कि उसमें कविता लिख सकूं, तो उसी भाषा में लिखता। कहते हैं, हर कविता सबसे पहले अपने लिए प्राथमिक शर्त की तरह 'सहानुभूति' की मांग करती है, तो यह भी करेगी..आप सब दोस्तों से, जो इस ब्लाग में आते रहे हैं। बार-बार हौसला बढा़ते हुए। बस इतनी इज़ाज़त दें कि इन कड़ियों को आपका यह लेखक निरंतरता में नहीं बल्कि ऐसी ही अनियतकालिकता के साथ लिखता रहे।)


(पांच)

वहां एक पहाड़ी नदी चुपचाप रेंगती हुई पानी बना रही थी
पानी चुपचाप बहता हुआ बहुत तरह के जीवन बना रहा था
तोते पेड़ों में हरा रंग भर रहे थे
हरा आंख की रोशनी बनता हुआ दसों दिशाओं में दृश्य बनाता जा रहा था

पत्तियां धूप को थोड़ी-सी छांह में बदल कर अपने बच्चे को सुलाती
किसी मां की हथेलियां बन रहे थे
कुछ झींगुर सप्तक के बाद के आठवे-नौवें-दसवें सुरों की खोज के बाद
रेत और मिट्टी की सतह और सरई और सागवन की काठ और पत्तियों पर उन्हें
चींटियों और दीमकों की मदद से
भविष्य के किसी गायक के लिए लिपिबद्ध कर रहे थे

पेड़ों की सांस से जन्म लेती हुई हवा नींद, तितलियां, ओस और स्वप्न बनाने के बाद
घास बना रही थी
घास पंगडंडियां और बांस बना रहे थे
बांस उंगलियों के साथ टोकरियां, छप्पर और चटाइयां बुन रही थी

टोकरियां हाट, छप्पर परिवार और चटाइयां कुटुंब बनाती जा रहीं थीं

ठीक इन्हीं पलों में आकाश के सुदूर उत्तर-पूरब से अरुंधति की टिमटिमाती मद्धिम अकेली रोशनी
राजधानी में किसी निर्वासित कवि को अंतरिक्ष के परदे पर कविता लिखते देख रही थी
उसी राजधानी में जहां कंपनियां मुनाफे, अखबार झूठ, बैंकें सूद, लुटेरे अंधेरा
और तमाम चैनल अफीम और विज्ञापन बना रहे थे

जहां सरकार लगातार बंदूकें बना रही थी

यह वह पल था जब संसार की सभी अनगिन शताब्दियों के मुहानों पर
किसी पहाड़ की तलहटी पर बैठे सारे प्राचीन गड़रिये
पृथ्वी और भेड़ों के लिए विलुप्त भाषाओं में प्रार्थनाएं कर रहे थे
और अरुंधति किसी कठफोड़वा की मदद से उन्हें यहां-वहां बिखरे
पत्थरों पर अज्ञात कूट लिपि में लिख रही थी

लोकतंत्र के बाहर छूट गए उस जंगल में
यहां-वहां बिखरे तमाम पत्थर बुद्ध के असंख्य सिर बना रहे थे
जिनमें से कुछ में कभी-कभी आश्चर्य और उम्मीद बनाती हुई
अपने आप दाढ़ियां और मुस्कानें आ जाती थीं।
 


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