प्रियंकर पालीवाल  की प्रेम कविताएँ

प्रियंकर पालीवाल, हिन्दी लेखन में एक जाना पहचाना नाम है, विशेषतया कविता के क्षेत्र में। अहिन्दी भाषी स्थल में हुते हुए भी वे बेहद सक्रिय हैं। इस अंक में पालीवाल जी की प्रेम कविताओं को प्रस्तुत किया गया है, जिनमें एक अलग तरह की लोच है।

दोना पावला की एक सांझ का अकेलापन

सागर
असीम है
अगाध है
मन को
भाता है
अपरिचय का सागर
दारुण है
दाहक है
मन अकुलाता है

कोई स्पर्श नहीं
सांत्वना का
कंधे पर नहीं
कोई विश्वासी हाथ
परिचय की नहीं
कोई स्निग्धता
नहीं कोई
स्नेही स्वजन साथ

एकाकीपन का
साथी है तो सागर -
हरहराता हुआ
आता है मेरे पास
कराता है
निकटता का अहसास
पूछता है
मेरे छोटे सुख
पूछता है
मेरे दारुण दु:ख
मेरी ही भाषा में

एकाएक
जी भर आता है
सागर
आंखों में लहराता है ।

मौन

कुछ समय
उन
स्मृतियों के
प्रवाह में
बहना चाहता हूं
और तुमसे
लय में कुछ
कहना चाहता हूं
पर सामने जब
निश्छलता की
साक्षात प्रतिमा हो
तो कोई क्या कहे

बेहतर है
मन से
मान दे
निश्छलता को
सादगी को
मौन रहे ।


प्रेम पत्र

कागज की नाव पर
तुम नहीं आ सकतीं
पर आ सकते हैं
तुम्हारे शब्द
नि:शब्द

सुबह की उजली
नर्म धूप की तरह
मन के आंगन में
उतर आता है
तुम्हारा स्नेह
कुछ यूं कि
जैसे झरते हों
रजनीगंधा के सूखे फूल
आहिस्ता से

फूल शुभकामना के
जिन्हें तुम
भेजती हो धड़कते हृदय से
मैं भी स्वीकारता हूं
कंपकंपाती अंजुरियों से ही

स्वीकार्य के बाद ही
तो आती है वह शक्ति

जिसके लिए विख्यात हैं
मनु के वंशज

स्नेह का स्वीकार्य
ही तो हर सकता है
जीवन के सब
दाह दंश पीड़ा और शूल
स्नेह का स्वीकार्य ही तो
सिखा सकता है
बहना धारा के प्रतिकूल

आज समझा हूं
अभिव्यक्ति की

इस सच्चाई को
कि क्षण चाहे अजर-अमर
न भी हों
पूर्ण होते हैं
सेतु चाहे कागज के हों
महत्वपूर्ण होते हैं ।

जब सब कुछ सीमाओं में कैद हो
तब भी आ सकते हैं
बिना किसी पारपत्र के
मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
तुम्हारे वे तरल शब्द
मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
तुम्हारे वे सरल शब्द ।

 

 


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