अशोक गुप्ता


अशोक गुप्ता की कविताएँ इस वक्त के उस वक्त से जुड़ी हैं, जिनमें परिवेश की वेदना पूरी तरह से झलक पड़ीं हैं। महानगर के दबे छिपे चेहरे को उभारती यें कविताएँ हमें अपने समय के सच से अवगत करवाती हैं।

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की ताज़ा कविता



मैं,

तुम्हारी मेज़ पर

अपना पर्स भूल आया हूँ

यह

मेरी बेख्याली में

कुछ नया नहीं हुआ है...



पर्स में

कुछ दूसरे छिटपुट कागजों के साथ

एक डायरी है

डायरी में लिखा है मेरे घर का पता

मुश्किल यह है

कि अब मैं

घर कैसे पहुँच पाऊंगा..



पर्स में

एक दस के नोट के साथ

सात और रुपयों के सिक्के भी हैं

दस का नोट

मुझे बस में बैठा कर घर ले जाता

और

एक सिक्का उछाल कर मैं तय करता

कि मैं

एक ठूँगा चना लूँ या दो तीन सिगरेट

तुम्हें पता है

ब्रांड देखनें का भला

मुझमें सब्र कहाँ है..



मेरा मोबाइल मेरी जेब में है

कोई चाहे

तो मुझे फोन कर सकता है

तुम

या मेरी बीबी

लेकिन कौन करेगा भला,

और

मेरे मोबाइल में पैसा नहीं बचा है.

सुना तो था तुमने

मैं तुम्हारे घर बैठा

उस फूलवाली से आधा घंटा बतियाया था

जिसकी दुकान से

मैंने तुम्हारे लिए फूल लिए थे

और तुमनें

चूम लिए थे मेरे हाथ

फूल थामते समय.



खैर छोड़ो,

रात तो मैं

रिट्ज़ के गेटकीपर के ठीहे पर गुज़र लूँगा

वहां बीड़ी तो मिलेगी ही,

हो सकता है पिछली बार की तरह

दो टुकड़ा ब्रेड भी मिल जाय.



लिखते लिखते मेरी यह कविता

पहुँच रही होगी तुम्हारे पास,

मेरा पर्स सम्हाल कर रखना

उसमें

जूही का पता है

कल

वह अस्पताल से

दमें का अधूरा इलाज छोड़ कर

घर आनें वाली है,

इलाज बहुत महंगा है.



मेरा पर्स

तुम्हारी मेज़ पर

फूलदान के पास पड़ा है.

 


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