फ़रीद ख़ान


फरीद की व्यथा वही है, जो छोटे स्थान से विस्थापित व्यक्ति की होती है, जमीन से टूटना, स्मृतियों को खगालते रहना, धीरे धीरे आदत में शामिल होता जाता है, उन्होंने अपनी इस व्यथा को बड़ी खूबी से इन कविताओं निभाया है।

भविष्य का सपना



मरने के पहले हर बाघ ने सपना देखा होगा हरियाली का।

आप किसी भी मरे हुए बाघ की तस्वीर देख लीजिए।

उनके चेहरे पर पीड़ा नहीं होती,

वे शांत और निर्भय होते हैं।



भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में भी दर्ज है,

"फांसी के पहले उनके चेहरे पर मौत का डर नहीं था"



यानी मौत अगर सामने हो,

तब भी, सुनहरे भविष्य का सपना ही काम आता है।

एक ग़ज़ल मामूली सी

*


खोले बैठा हूँ किताब, कोई चेहरा तो दिखे,

अक़ीदा आम है तुझ पर, कोई जलवः तो दिखे।



सुनी है बहुत तेरी करामात कि यूँ,

तू है तो रेगज़ार में इक दरिया तो दिखे।



मैं क्यों कर तेरे मुक़ाबिल हुआ मैं तो,

पागल हूँ पर तेरी भी कोई राह तो दिखे।



सुना है तू बड़ा अज़ीम है रहीम है,

फिर क्यों जाबजा तेरा डर सरेआम दिखे।



रहने दे ख़्वाहम्ख्वाह की बातों में मत उलझा,

मुहाफ़िज़ है, तो यह कैसी हिफ़ाज़त है दिखे।



*(नोट: पहला मिसरा अजय ब्रह्मात्मज जी ने दिया है।)*


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