मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 

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कृत्या में हम
आजतक शब्द शक्ति
की बात करते रहे हैं,
लेकिन हाल में
आयोजित कविता
कार्यशाला में युवा
कवि कलाकार अनूप
ने एक कविता सुनाई,
जिसमें उसका सवाल
था कि हमारे पास
पहुँचने वाले शब्द
अपने आप में एक
विशेष अर्थ से गर्भित
होते है, और जो भाव
या विचार मन मे
जन्म लेते हैं ,
वे अपने में अर्थ
गर्भित होते हैं। ऐसे
में जिन बने बनाये
शब्दों की खोल
विचारों, भावों को
पहनाई जाती है, कभी
कभी ही सही बैठती
है। ऐसे में कभी
कभी शब्दों में पैठते ही हमारी कविता
आत्महत्या कर लेती
है। शब्द को अनन्त
मानने वाली भावना
को लेकर जीने वाली
मैं, इस तर्क के
सामने निस्साहाय सी
महसूस करने लगी।
सही तो है, विचार जब
मन में उमड़ते हं, तो
उनका फलक बेहद
विशाल होता है। उन्हें
शब्दों का जामा
पहनाने में कभी
कदार बेहद मेहनत
करनी पड़ती है।
कभी कभी तो विचारों का
जखीरा बिना शब्दों के
ही लौट जाता है।
तो हम विचारों का
क्या करते हैं?......
रिपोतार्ज-कविता - कार्यशाला

रति सक्सेना

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वह जा रही थी
अपने घर
बैठ कर रिक्शा में
लगी- राजकुमारी-सी
मैंने कुछ नहीं किया
मैं जल्दी में था ।
बस खुशी छ्लकी
अपनेआप ।
उसने भी
देखा होगा जल्दी में,
मगर किसे-
मुझे या खुशी को ?
नीरज दइया
ओ मेरे शरीर आज तुम कितने थके
आज तुमने कितनी सीढ़ियां चढ़ीं
सारे दिन तुमको बाईक पर घुमाता रहा
सुबह न एक्सरसाइज दी न नाश्ता किया
तुम्हें लिए लिए देर तक पड़ा रहा
फिर जल्दी पहुंचने की भागम-भाग में
दौड़ता रहा, खींचता रहा, धूप और धूल में
रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
प्रसिद्धि के
रॉबिनहुड घोडे का
जिक्र यूं
बीमार हों या
आयकर का नोटिस
मिला हो
दुआओं में उठने लगते हाथ
करोड़ों
हमारा सुख
शैलेन्द्र चौहान
उसके सपनों में सैलाब थे
भंवर के बीच खिलते कमल थे
एम्फीथियेटरों में भटकती
वह उनके गलियारों में नाचती थी
मनीषा कुलश्रेष्ठ

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वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' जिनको हम बाबा
नागार्जुन के नाम से
जानते है यदि आज
हमारे बीच होते तो
सौ साल के होते .
इस वर्ष साहित्य
जगत जन्म शताब्दी
मना रहा है उनमे
से एक बाबा नागार्जुन भी है .हिंदी, मैथिली,
संस्कृत और बांग्ला
भाषा में काव्य रचना
करने वाले
बाबा नागार्जुन एक
प्रगतिशील यानी प्रखर राजनीतिक चेतना वाले, आवेगशील घुमंतू
स्वभाव के कवि रहे है .हिंदी के आधुनिक
कबीर बाबा नागार्जुन
के काव्य की पहुच
किसान की चौपाल से
लेकर काव्य रसिको
की काव्य गौष्ठियों तक है . स्कूल
के जमाने में मैंने इनकी प्रसिद्ध कविता
अपनी हिंदी की
किताब में पढ़ी थी जिसमे इन्होने अकाल और इसके
बाद की परिस्थितियों
का वर्णन बहुत
संवेदनशीलता से
किया है -
''कई दिनों तक चुल्हा
रोया,चक्की रही उदास .
कई दिनों तक कानी
कुतिया सोई उसके ,br>पास .
दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद,
धुँआ उठा आँगन से
ऊपर कई दिनों के बाद. ..

''प्रस्तुति -
सी सुमन
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सिर नहीं
है सिर की जगह
औंधी रखी हंडिया
देह -
लाठी का टुकड़ा
हाथों की जगह पतले डंडे
वस्त्र नहीं है ख़ाकी
फिर भी
क्या मजाल किसी की
एक पत्ता भी चर ले कोई
तुम्हारे होते !
**
मेरी जड़ें
जमीन में कितनी गहरी हैं
यह सोचने वाला पेड़
आंधी के थपेड़ों से
उलट गया जमीन पर
कितने दिन रहेगा
तना हुआ मेरा पेड़-रूपी बदन ?

रोज चलती है
यहां अभावों की आंधी
धीरे-धीरे काटता है
जड़ों को जीवन

अब
यह गर्व फिजूल
मेरी जड़े
जमीन में कितनी गहरी हैं ?

*
गूंगा गुड़ के गीत गा रहा है
बहरा सराह रहा है
सजी सभा में
पंगुल पांव सहला कर बोला -
मैं नाचूंगा ।
अंधा आगे आया
कड़क कर बोला -
तुमने ठेका ले रक्खा है
मुझे भी तो देखने दो
कलाकार !
लो, संभालो तुम्हारी कलम !
साँवर दइया
और »  

 
ओ३म् केनेपितं पतति
प्रेषतं मनः ,
केन प्राणः प्रथमः
प्रैति युक्तः।
केनेपितां वाचमिमां वदन्ति,
चक्षु श्रोत्रं क उ देवो
युनक्त?।।१।।
प्रेरित होता हरदम,
उठते मन में नाना भाव।
क्रम बना संकल्प विकल्प का,
कहो इसे मानव स्वभाव।।
कौन प्रेरण देता
मन को।
क्या इस पर भी
किया विचार?
अभीष्ठ विषय प्राप्त
वह करता,
बन जाता मन
बड़ा सकार।।
सभी इन्द्रियों में वासित मन,
फैला इसका विस्तृत रूप।
किसका है सामर्थ्य
मूल में,
बात तत्व की बड़ी अनूप।।
प्राणी की रक्षा में
देखो,
मन में रहते उत्कृष्ट भाव।
गतिमान चंचल
होता मन, किसके
आखिर आविर्भाव।।
परम शक्ति का
महाप्रदाता,
आखिर कौन वह
दिव्य देव?
वाणी लोचन, कर्ण
सभी ये,
हर प्राणी को देय सदैव।।
धरती पर जितने
प्राणी, एक ही दिव्य
देव प्रदाता, प्राप्य नहीं
वहदेव अन्यत्र।।
डा. अस्त अलीखां मलकांण द्वारा केनोपनिषद का अनुवाद
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VOL - VI/ ISSUE-I

(जुलाई -  2010
)

संपादक :  रति सक्सेना


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