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"कृत्या" में हम आज तक शब्द शक्ति की बात करते रहे हैं, लेकिन हाल में आयोजित कविता कार्यशाला में युवा कवि कलाकार अनूप ने एक कविता सुनाई, जिसमें उसका सवाल था कि हमारे पास पहुँचने वाले शब्द अपने आप में एक विशेष अर्थ से गर्भित होते है, और जो भाव या विचार मन मे जन्म लेते हैं , वे अपने में अर्थ गर्भित होते हैं। ऐसे में जिन बने बनाये शब्दों की खोल विचारों, भावों को पहनाई जाती है, कभी कभी ही सही बैठती है। ऐसे में कभी- कभी शब्दों में पैठते ही हमारी कविता आत्महत्या कर लेती है।

शब्द को अनन्त मानने वाली भावना को लेकर जीने वाली मैं, इस तर्क के सामने निस्साहाय सी महसूस करने लगी। सही तो है, विचार जब मन में उमड़ते हैं, तो उनका फलक बेहद विशाल होता है। उन्हें शब्दों का जामा पहनाने में कभी- कभार बेहद मेहनत करनी पड़ती है। कभी- कभी तो विचारों का जखीरा बिना शब्दों के ही लौट जाता है।
तो हम विचारों का क्या करते हैं? यदि रंगों से खेलना आता हो तो हम उन्हें रंग पहनाने लगते हैं, और जब वे भी फीके पड़ जाएँ तो धुन... लेकिन ऐसा भी होता है कि हमारी दोस्ती केवल शब्दों से होती है। रंग और धुनें हमारे दोस्त नहीं बन पाते हैं, सच में ऐसे में बड़ी घुटन होती है।

मैं इसी धारा पर मनन करने बैठती हूँ तो लगता है कि अरे, यही तो चमत्कार है शब्दों का, वे विशाल से विशाल फलक को संक्षिप्त बना कर उसकी संम्प्रेषणीयता बढ़ा देते हैं।

लेकिन समस्या यह है कि वे पहले से उपयुक्त होते हैं, उनके बने बनाये अर्थ होते हैं। तो उनमें हमारे नए भाव बैठते ही पुराना अर्थ नहीं ढोने लगेंगे। लेकिन कविता शब्दों को गढ़ने और उनको नए मुहावरों मे ढालने का भी तो काम करती है। यानी कि कविता पुराने अर्थों के खोल में घुसने का नाम नहीं, नए- नए शब्द गढ़ने और नए अर्थ तलाशने का काम भी तो कविता का है।

 कबीर यूँ ही नहीं कह गए... साधौ! शब्द साधना कीजे!

शब्द की साधना करना और उन्हें गीली मिट्टी की तरह मांडना, फिर अपने भावों के अनुरूप आकार देना इतना आसान नहीं है। कभी वे बेलगाम घोड़े सी दुलत्ती मारते है तो कभी वे पालतू बिल्ली की तरह गोद में आकर बैठ जाते हैं। कभी चटक से खिल जाते हैं, तो कभी काँटे से गड़ जाते हैं।
साधौ ! शब्द साधना कीजे...कवि शब्द साधना करो...

इस आयोजित कार्यशाला की एक साधारण सी रिपोर्ट भी अपनी बात के साथ नत्थी की जा रही है।
 

इस अंक के कलाकार हैं Franck Ramo जो फ्रांस के कलाकार हैं


मित्रों! हमने छटे वर्ष में प्रवेश कर लिया है, कविता के प्रेमियों को बधाई!


शुभम


रति सक्सेना

कविता - कार्यशाला

"कविता किसके लिए? "या फिर कविता किस लिए? यही मुद्दा था, उन २० युवा कवियों के सामने, जो कृत्या की कार्यशाला में भाग लेने के लिए अंगमाली में "समीक्षा" नामक स्थल पर एकत्रित हुए थे। सबसे पहले तो "समीक्षा" का ही परिचय दे दूँ। लहलहाती पेरियार नदी के किनारे बसा यह आश्रम अपने में अद्भुत है। अद्भुत मात्र इसलिए नहीं कि यह अद्भुत स्थल प्राकृतिक सुषमा से भरपूर है, बल्कि इसलिए भी कि यहाँ के संरक्षक फादर S Painadath Sj इस धार्मिक कलुषता वाले समय में सहिष्णुता का अद्भुत उदाहरण पेश कर रहे हैं। सभी धर्मों के सामन्जस्य से ईसाई धर्म को नया आयाम देते हुए वे एक ओर Labyrinth के ध्यान योग से भारतीय परवेश में पले- बढ़े बच्चों को जोड़ते हैं, तो दूसरी ओर वे सोहम के जाप से GOD से साक्षात्कार करवाने की कोशिश करते हैं।
  मैं कविता की बात करते-करते समीक्षा की बात करने लगी हूँ....हाँ,  तो इतने अदभुत आश्रम में कार्यशाला आयोजित हुई। बीस युवा कवियों के साथ दो कवि विशेषज्ञ थे‍, रौशनी वापना और आर्यड वासुदेवन नम्बूदिरि। जयपुर से अमित कल्ला विशेष रूप से कार्यशाला में भाग लेने आये थे। अमित की उपस्थित ने केरल के युवा कवियों में विशेष उत्साह भर दिया। आश्रम के पारम्परिक शैली में बने सेमीनार कक्ष में फादर S Painadath Sj  ने कार्यशाला का अनौपचारिक उदघाटन किया और कविता के आध्यात्मिक स्वरूप को उपनिषदों के माध्यम से सशक्त करने का उपदेश दिया। कलाकार Roy M Thttam ने कविता को पेन्टिंग से जोड़ते हुए नए रंग तलाशने की सलाह दी। इस अनौपचारिक उदघाटन के उपरान्त विषय युवकों के हाथ में था।
पार्वती, बिजू, सोबिन, अंजू, अनूप, बिनेश, शिवदासन, अखिल आदि लगभग बीस युवा कवियों की चर्चा का उद्देश्य बेहद स्पष्ट था। वे सब कविता से स्नेह करते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कविता को पनपने के लिए कोई भूमि क्यों नहीं तैयार की जा रही है। अधिकतर कवियों का निशाना उनके सीनियर कवि का व्यवहार था। उनकी शिकायत थी कि एक समय था, जब बड़े कवि युवा कवियों के साथ चर्चा करते थे, जिससे कविता के साथ-साथ सभी कलाओं के लिए भावभूमि तैयार होती थी। लेकिन आज के फिल्मी माहौल में, न तो युवा मानस कविता के लिए तैयार हो रहा है, और न ही स्थापित कवि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

दूसरा प्रमुख मुद्दा था, विषयवस्तु को लेकर। रौशनी ने इस विषय पर एक बड़ी खुबसूरत कविता सुनाई- नदी तट पर स्थित जिसमें एक भग्न घर, जिसे सरकार नदी सफाई योजना के अन्तर्गत गिरा देना चाह रही है- अपनी इच्छा व्यक्त करता है। घर का गृहत्व उसमें रहने वाले इंसानों से ही नहीं, कुत्ते, बिल्ली और अन्य जीवों के साथ पेड़ पौधों से भी होता है, यह बात केरल में खासतौर से समझी ही नहीं जा रही है। केरल प्राकृतिक दृष्टि से बेहद समृद्ध प्रान्त है, प्राकृतिक सौन्दर्य एक वक्त यहाँ की कविता की विशेषता रही है। सोबिन का विचार था, कि आज के दौर पर इस तरह की कविता से परहेज करना चाहिए, लेकिन मैंने उसे यह सुझाव दिया कि प्रकृति कविता का केन्द्र बिन्दु है, उससे कटना सम्भव नहीं है। आज जिस तरह से केरल में प्रकृति का हनन हो रहा है, हरियाली को काट कर कंक्रीट का जंगल खड़ा हो रहा है, उससे हमारे सामने बड़ी चुनौती खड़ी होती है। ऐसी अवस्था में नोर्वे के कवि हेल्गे हमारे लिए एक उदाहरण बन कर आते हैं। उन्होंने नोर्वे में प्राकृतिक सुषमा ही नहीं,जंगल, तट सभी को बचाने के लिए एक अभियान छेड़ रखा है। केरल में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। खाड़ी के धन ने केरल को कंक्रीट के जंगल में बदलने मे कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसे वक्त में प्रकृति को नकारना उचित कदम नहीं। हाँ, इस बात का ध्यान रखना है, कि प्रकृति के हनन को लेकर चिन्ता जाहिर करने का तरीका समकालीन होना चाहिए। यानी कि हमें प्रकृति को ऐसे रूप में प्रस्तुत करना होगा, जिससे मुद्दे पैदा हों।

भोजन के बाद हम लोग पेरियार नदी के तट पर टहलने गए, और लौट कर आश्रम के गोलाकार चबूतरे पर लगी बैंचों पर बैठ कर कविता का लुत्फ उठाने लगे। कविता केवल संवाद का माध्यम नहीं हो सकती है। इसलिए अब वृक्षों के साक्ष्य में कविता पाठ करने लगे तो विचित्र आनन्द का अनुभव हुआ। प्रत्येक कविता के उपरान्त कविता को लेकर चर्चा होती रही। केरल के युवाओं का विचार गीतात्मक शैली के विरोध में था। जो सही भी माना जा सकता है। लेकिन मेरी एक सलाह थी,  कि पारम्परिक शैली की पूर्ण अवहेलना नहीं करनी चाहिए। अनूप ने एक बड़ी अच्छी कविता पढ़ी, जिसका भाव था कि पहले से रचित शब्दों में एक कवि मन का भाव पूरी तरह से कैसे समा जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि शब्द कवि भावों की कब्रगाह बन जाते हैं? युवा कवियों की कविताओं का फलक बेहद बड़ा था, भृकुटी से से लेकर चप्पलों तक, जिन्दगी से लेकर फुटबाल और मोबाइल फोन के आइडिया तक फैले विषय को यह पीढ़ी जिस तरह अपनी कविता में संजो लेती है, देखने योग्य था।

कविता के बाद अनूप ने पुनः एक सवाल उठाया- हम किसलिए कविता करें, हर युवा का कार्यक्षेत्र अलग है, वह उसमें व्यस्त है। कविता महज समय गुजारने का माध्यम बन गई है यानि कि मनोविनोद, अब मनोविनोद की कविता से हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं, कि उसमें सामाजिक दायित्व सम्मिलित हो? कवि कर्म को सामाजिक कर्म में कैसे परिवर्तित किया जा सकता है?
इस विषय पर काफी बहस हुई, कविता करना या ना करना हमारे वश की बात कहाँ, यह तो एक माध्यम है, जो हमें अनायास मिला है। मेरा सुझाव था, जिस पर काफी विवाद भी हुआ। लेकिन बाद में सभी ने माना कि कविता की घुसपैठ अच्छे या बुरे रूप में हर जगह है। आटो रिक्शा या ट्रक का पिछवाड़ा हो, या ज्वेलरी की दूकान। यहाँ तक कि फुटबाल पर भी अच्छी कविताएँ विज्ञापन के रूप में लिखी जा रही हैं। मोबाइल फोनों पर तो कविता का बड़ा प्रभाव है। यानी कि कविता मरी नहीं, उसका चेहरा बदल गया। युवा कवि को इसी नए चेहरे को अपनाना है।

साँझ गहराने लगी। झिंगुरों की टिटियाहट तेज होने लगी, जायफल टपाटप टपकने लगे...

हमें भी कार्यशाला समाप्त करना है, यही प्रकृति का आदेश है।

रति सक्सेना

 



 
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