डा. अस्त अलीखां मलकांण द्वारा केनोपनिषद का अनुवाद

काफी वक्त पहले, जब मेरे पास अपना पुस्तकालय बनाने का समय नही था, मैंने हर जगह किताबें ठूंस रखी थी। अब जब नन्हा से पुस्तकालय के लिए जगह निकली तो उन किताबों की याद आई जो तंग अलमारियों में ठुंसी पड़ी थीं लेकिन दीमकों ने मेरा काम ही कम कर दिया, कहने लगी कि तुम ना चाटो तो हमें ही चाटने दो, उन्हीं चटी पुस्तकों मे एक हस्तलिखित पुस्तक हाथ लगी, जिसे कभी अस्त अलीखां मलकांण जी ने भेजा होगा। मैं उनके बारे में बिल्कुल नहीं जानती, संभवतया राजस्थान डीडवाना के रहे होंगे। पर अब आभार सहित उनके अनुवाद को कृत्या के पाठकों के सम्मुख रखना चाह रही हूँ।

ओ३म् केनेपितं पतति प्रेषतं मनः , केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः।

केनेपितां वाचमिमां वदन्ति, चक्षु श्रोत्रं क उ देवो युनक्त?।।१।।


प्रेरित होता हरदम, उठते मन में नाना भाव।
क्रम बना संकल्प विकल्प का, कहो इसे मानव स्वभाव।।
कौन प्रेरण देता मन को। क्या इस पर भी किया विचार?
अभीष्ट विषय प्राप्त वह करता, बन जाता मन बड़ा सकार।।
सभी इन्द्रियों में वासित मन, फैला इसका विस्तृत रूप।
किसका है सामर्थ्य मूल में, बात तत्व की बड़ी अनूप।।
प्राणी की रक्षा में देखो, मन में रहते उत्कृष्ट भाव।
गतिमान चंचल होता मन, किसके आखिर आविर्भाव।।
परम शक्ति का महाप्रदाता, आखिर कौन वह दिव्य देव?
वाणी लोचन, कर्ण सभी ये, हर प्राणी को देय सदैव।।
धरती पर जितने प्राणी, देह में वाणी कर्ण अरु नेत्रे।
एक ही दिव्य देव प्रदाता, प्राप्य नहीं वह देव अन्यत्र।।
प्रश्न अनेक हमारे सम्मुख, विश्लेषण मानव की देव।
कौन सत्य अरु सक्षम देन।।


श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ, प्राणस्य प्राणः।
चक्षुपश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्या स्माल्लोकादमृताः भवन्ति।। २।।


सार्वभौम सर्वज्ञ स्वयम्भू , जिसे इन्द्रियाँ नहीं दरकार।
परम पिता कृपालु ईश्वर, सभी इन्द्रियाँ भिन्न प्रकार।।
मनुज विवेकी भौतिक बल पर,वेदोक्त ज्ञान को करे प्राप्त।
स्थूल का महात्म्य लख कर, सूक्ष्म ओर बढ़े उद्दांत।
भौतिकता का परित्याग कर, भौतिक इन्द्रियों से रह कर दूर।।
दिव्य इन्द्रियों के बल पर वे, सुनना चाहें अनहद तूर।।
सहस्र अक्ष प्रभु सहस्र पाद हैं, इन्द्रियों से दूर नितान्त।
सार्वजनिक सर्वज्ञ सार्विक, कहीं शान्त तो कहीं अशान्त।।
परमात्मा ज्ञान से अल्पज्ञ हम, इस बारे में कुछ नहीं ज्ञान।
इसलिए मानव को उसने, भौतिक इन्द्रियाँ की प्रदान।।
सर्व इन्द्रियाँ धारण कर भी, होता जिनमें नहीं विवेक।
पापकर्मों में प्रवृत्त होकर, अनुभव करते दुखातिरेक।।
सतत गमन सूक्ष्मता में,संभव तभी मोक्ष है मीत।
ईश्वर सदा इन्द्रियातीत।।


न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विनाजामो,
यथैतदनुशिप्यादन्येदेव तद्धिदितादयो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्वयाचच क्षिरे।।३।।


काम सरे न नेत्र वाणी से,मन भी चाहे भरे उड़ान।।
पार ना पावें पर ब्रह्म का, मानव रहता पूर्ण अज्ञान।।
मनुज मनीषा निष्फल बनती, वर्णन बन जाता निस्सार।।
इन्द्रियातीत वह अलख निरंजन, सर्व गुणों का वह आगार।।
ज्ञात अज्ञात पदार्थों से वह, पाया जाता बिल्कुल भिन्न।
रूपरेखा में बद्ध नहीं वह, जीव जगत से नहीं अभिन्न।।
यद्यपि हम परोचित हैं उससे, याद करें दिन मे सौ बार।
फिर भी बता नहीं हम सकते, कैसा रूपार, क्या आकार?
पुरखों का यह कथन सत्य है, देखा आज तलक नहीं कोय।
वाणी से न उजागर होय।।

 


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