हरिओम राजोरिया की कविता


रंगदार लड़का

अपने चटकीले रंगों के साथ
कहीं दूर भाग गया
रंगदार लड़का

खोये हुए व्यक्तियों में
उसका जिक्र नही
कोतवाली में नहीं है उसके नाम की रपट

उसकी कोई फोटो
नहीं छपी अखबार में
उसके लापता होने से
बीमार नहीं हुई माँ
नहीं पड़ा पिता को दिल का दौरा

किसी को क्या पता
कहाँ गया रंगदार लड़का
कोई जानना भी नहीं चाहता
की वह पटना है या भोपाल

किसी की जुबान पर
अब उसका नाम नहीं
कोई सबूत नहीं
की कभी था भी रंगदार लड़का
रंगदार लडके की गैर मौजूदगी ने
नहीं छोड़ा कोई खालीपन
हाँ इतना जरूर है
की भेलसा जाने वाली सड़क
जो उसकी एक अदा पर
बिछ जाती थी उसके कदमो में
आज कुछ उदास है |

( हरिओम राजोरिया की अन्य कविता)
 


राजेश जोशी की कविता

बच्चे काम पर जा रहे हैं

कोहरे से ढकी सड़क बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह

बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

क्या अंतरिक्ष में गिर गयी हैं गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गयी हैं
सारे मदरसों की इमारतें

क्या सारे मैदान , सारे बगीचे और घरों के आँगन
ख़त्म हो गए हैं एकाएक

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह
की हैं सारी चीजें हस्बमामूल

पर दुनिया की हजारों सडकों से गुजरते हुए
बच्चे , बहुत छोटे - छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं |

( राजेश जोशी की अन्य कविताएँ )
 


विद्या गुप्ता की कविता


सुबह से पहले -रात के बाद

सूरज
और
मुर्गा
दोनों ही जागते हैं
उसके जागने के बाद

वह ,
आँखों को पूरी तरह खोलने से पहले ही ,
कर लेती
स्वयं अपना विभाजन |
बाँटती बराबर
पहला घर
दूसरा घर ,
तीसरा...... चौथा |
झाड़ू , पोंछा , बर्तन , कपड़ा
अपने टुकड़े समेट
उसके घर आने तक
सो जाता ,
पश्चिम में सूरज
दड़बे में मुर्गा |

सूनसान गली के नुक्कड़ पर
अकेले ,
डरते ,ठिठुरते , लड़ते
उसके चारों असभ्य बच्चे
देखते माँ की राह |

दिनभर के बाद
हाथ में कटोरा लिए ,
दिखाई देती माँ |
बच्चे दौड़ कर लिपट जाते
माँ से नहीं ,
कटोरे वाले हाथ से |
माँ / परे धकेलती ,
चलती घर की और
बच्चे ,
दौड़ते आगे पीछे
साथ - साथ
कटोरे के अदेखे स्वाद से बंधे |

और फिर
रात गए
अँधेरी झोपड़ी के चूल्हे में
उगता है सूरज
अंगारों की शक्ल में |

( विद्या गुप्ता की अन्य कविताएँ)


शिबब्रत देवानजी की  कविता
 (बांग्ला कविता)

दूसरा ही आदमी


एक अच्छा इन्सान मिले तो
मै भी फूल खिलाऊँ
एक अच्छा इन्सान मिले तो
मै भी आनंद के गीत गाऊं
अच्छा इन्सान होता है ईश्वर की तरह
जबकि ईश्वर निराकार होता है |

पर अब पृथ्वी अस्थिरता से काँप रही है
असहाय से हैं हमारे आवास स्थल
हम उकडू होकर स्वास ले रहे हैं
इन्सान - इन्सान में कितना फर्क है अब
जड़ों से लिपटे पड़े हैं फिर भी -------------
मिट्टी का खिंचाव नहीं है |

इस कालखंड में अच्छे इन्सान विरले हैं
ईश्वर और मनुष्य
मनुष्य और ईश्वर
बीच में कही तो संशय है ही-------------
फिर भी एक अच्छा इन्सान मिले तो ,
मै भी एक फूल खिलाऊ |


अनुवाद ------ मिता दास |


(शिबब्रत देवानजी की अन्य कविताएँ)


भरत तिवारी की गजल



दुश्मनो से भी मिलो तो यार की तरहें मिलो

सर्द सुबहों की नरम सी धूप की तरहें मिलो १



दूर हो कर खत्म ना हो ये मुहब्बत देख लो

साँस से, बारिश की सोंधी खुशबू की तरहें मिलो २



हो मिरे हमराह तो हर मोड़ पे मिलना मुझे

ता-उम्र ना हो जुदा उस राह की तरहें मिलो ३



चाँद बेटी में दिखे तो रोज़ घर में ईद हो

बाप हो जिसके उसे हमराह की तरहें मिलो ४



तुम “शजर” बचपन रिहा कर दो उम्र की क़ैद से

और अपने आप से तुम दोस्त की तरहें मिलो ५

 

(भरत तिवारी  की अन्य कविताएँ)


सुधीर सोनी की कविता
 

रोटी और फांकों के बीच



पहाड़ के गर्भ से

जिसने निकला कच्चा लोहा

उसने लोहे से बिना पूछे

तवा बना दिया

बेहिचक मै ले आया

मैंने लकड़ी से नहीं पूछा

ना ही पूछा आग से

आग ने तवे से नहीं पूछा

और तवे में रोटी बनाना

मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया



बची हुई रोटियां

मैंने ढांक रख दी पतीले से बिना पूछे

पतीले से बिना पूछे

चीटियाँ घुस गयी

चीटियों ने रोटी नहीं पूछा

और उसे फांके में बदल दिया



चीटियों कि पहुँच

जंगल तक है

पीछे पीछे जाकर

जिसने लकड़ी ले आया

लकड़ी से पूछे बिना

कुर्सी बना दी

उसमें बिठा दिया राजा

राजा ने नियम बनाए

कानून में जकड़ा आदमी को

राजा बदलता गया

नियम कानून बदलते गए

कुर्सी बदलती गयी

लोहे की भी बनी

लकड़ी की भी बनी

पर आजकल कुर्सी की वजह से

पेट की आग

ठण्डी हो नहीं पाती

रोटी सहज रूप में मिले

इसीलिए

राजा के खिलाफ

विद्रोही नारें बुनती

मेरे साथ हाथ उठाये

चीटियों भी खड़ी हैं


(सुधीर सोनी की अन्य कविताएँ)


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