आधुनिक यूरोप की कविता

कविता को किसी भाषा के दायरे में बन्द नही किया जा सकता। इसलिए जब हिन्दी में कविता की बात करते हैं तो हमारे लिए यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम अन्य भाषा में रची जाने वाली कविता से भी परिचित होते रहें। यह कृत्य अनुकरण को ध्यान में रख कर नहीं बल्कि इस दृष्टि से किया जाना चाहिये कि हमे जानकारी मिले कि हमारे आसपास क्या घटित हो रहा है। इससे कविता की सोच  धार आ सकती है। श्रीप्रकाश मिश्र जी कविता के बारे में एक परिपक्व सोच रखते हुए नवीन को स्वीकारने का माद्दा रखते हैं। उन्नयन पत्रिका इसका उदाहरण है। श्रीप्रकाश जी ने आधुनिक यूरोप की कविता पर जो चिन्तन किया है वह विशद व विचारवान है, अतः हम उनके लेख को धारावाहिक क्रम में प्रस्तुत करेंगे जिससे हिन्दी के पाठक अपने को वैश्विक दृष्टि से तौल सकें।
                 संपादक


  

आधुनिक यूरोप की कविता

                       श्रीप्रकाश मिश्र


हमारे समय में कविता के दो लक्ष्य उभरे हैं- सौन्दर्य और मानवता। अब सौन्दर्य क्या है कविता के सन्दर्भ में...इसे अभी तक कहीं भी आधिकारिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। स्थूल कलाओं में जरूर प्रयत्न हुआ है, जहाँ कहा गया है कि वह एक तरफ अंगों के आनुपातिक लगाव ‌और समुच्चय, भव्यता और आँखों को अच्छा लगना बहुत वस्तुगत नहीं होता। हमारी जातीय चाहतें, स्मृतियाँ और व्यक्तिगत रुचि आदि उसका निर्णायक होती हैं। यह भी कहा जाता है यदि निर्माण ठीक ठाक हो गया होता है, एकदम से परफेक्ट हो गया होता है तो वह उबाऊ हो जाता है। ..कला दरअसल पूर्णता प्राप्त होने में जो बचा रह जाता है, जिसे दर्शक अपनी अपनी तरह से पूरा करते हैं और ऐसा करने में जो आनन्द लेते हैं , कला वहाँ होती है। यानी जो हमारी कल्पना को स्फुरित करे , वह भी दिए ढाँचे में, कला वहाँ होती है। वही सौन्दर्य होता है। कविता के संबन्ध में कहा जाता है कि वह भीतर की चीज होती है जो अन्ततः कल्याण भावना की ओर ले जाती है।
यह कल्याण भावना ही उसे मानवता से जोड़ती है । इस मानवता के दो रूप हैं। एक तो वह जो मानव पर जोर देती हैः आदमी चाहे जहाँ का हो और जिस किसी भी रूप में हो, उसका भला होना चाहिए। यहाँ आदमी के बरक्स दूसरे जीवधारी काव्य होते हैं और साधन स्वरूप होते हैं।
आदमियों में भी वे नगण्य हैं जो बृहत्तर कल्याण में बाधक होते हैं। उन्हे नष्ट कर दिया जाना चाहिए, जिससे वह कल्याण सबमें बाँटा जा सके। यह अन्ततः तानाशाही की ओर ले जाता है... चाहे वह व्यक्ति विशेष की हो या समुदाय विशेष की। दूसरा मानवता पर जोर देती है। एक तरफ वह व्यक्ति को अपने सन्दर्भों में स्वत्नंत्र रहने के लिए हिमायत करती है तो दूसरी तरफ जब वह व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों के सन्दर्भों में उनके सम्पर्क में आता है जिससे कहीं टकराव तो कहीं एका पैदा होती है उसे सामाजिक सन्दर्भों में अभियन्त्रित करना चाहती है, जहां तक हो सबकि सहमति से। यह प्रजातन्त्र की स्थापना करती है। आधुनिक यूरोप की कविता दोनों से स्फुरित हुई है। वह आदमी बनाम प्रकृति व स्वभाव ( अंग्रेजी में दोनों के लिए एक ही शब्द नेचर उपयुक्त होता है) से आगे बढ़ती है। जो बाह्य है, प्रकृति है उसकी गहराई और सौन्दर्य का वर्णन रोमान्टिक कविता में है। जो मनुष्य का स्वभाव है - उसकी गहराई और तदजन्य खुदाई से उत्पन्न सौन्दर्य का वर्णन आधुनिक कविता में है। जहाँ वह मानवता से जुड़ती है वहाँ वह मानववाद और मानवता दोनो से अवगणित है। इन सबका समुच्चय आधुनिकतावाद है।
इस कविता की कई रीतियाँ हैं, पहली रीति वाल्तेयर की है, जो कविता में आधुनिकता का वास्तविक जनक है। वह कहता है कि आधुनिक समाज में कवि की भूमिका मसीहा की है, क्योंकि परंपरागत ढंग के मसीहों का जन्म अब असंभव हो गया हध। जो सामाजिक , राजनीतिक या नैतिक संस्था‌ओं के शीर्ष पर हैं वे लगभग जड़ और तानाशाह हो चुके हैं। इतने कि न तो वे कुछ नया दे पाने की स्थिति में हैं , और न ही उनकी आलोचना सामान्य जन के लिए खतरे से खाली है। यह दोनो ही भूमिका अब कवि को अख्तियार करनी है। इसकी तार्किक परिणिति तो यह होती है कि कविता सोच कर, विचार कर, सोच और विचार दोनो के लिए लिखी जानी चाहिए। इससे हावी वर्ग को खतरा था। इसलिए उनके एक शिष्य मलार्ले की एक उक्ति को सन्दर्भो में काट कर बहुत प्रचारित की गई, कवि और कविता की भूमिका को नीचा करने के लिए। उक्ति थी- कविता विचारों से नहीं शब्दों से लिखी जाती है, और सन्दर्भ था डेगा की एक जिज्ञासा- मेरे दिमाग में अच्छे अच्छे विचार आते हैं लेकिन मैं कविता नही लिख पाता, क्या करुँ? जाहिर है कि मलार्ले ने जो समाधान दिया था, वह विचार को खारिज करने के लिए नहीं, बल्कि उसे शब्द में पकड़ कर रखने के लिए था। लेकिन कमजोर कलावादी कवियों ने उसे शब्द तक ही सीमित कर दिया। परणिति स्वचालित लेखन में होने लगी। - जो भी दिमाग में शब्द आएँ, उन्हे अण्ट शण्ट तरीके से रखते चले जाएँ, बिना अर्थ पर ध्यान दिए। कुछ नवीनता के पुजारी अति उत्साहित लोगों ने इसका एक शास्त्र ही गढ़ना चालू कर दिया। यह एक तरफ अति यथार्थवाद की ओर ले गई और दूसरी तरफ अतियथार्थवाद की ओर।
हालाँकि इनका कोई ऐतिहासिक क्रम नहीं था।

अति यथार्थवादियों ने लेखन को अचेतन मन का कलाप माना, जो इस कलाप के साथ चेतन मन की कारवाई के साथ समन्वय स्थापित करता है। चेतन मन व्यक्ति बाह्य मन को अभ्यान्तरिक करता है। उसी से अचेतन मन की ग्रस्थावस्था की निर्मिति होती है जो पुनर्सृजन में बाह्य पर एक नई दृष्टि प्रदान करती है। इस में रचना अतार्किक ढंग से विकसित होती है क्यों कि मन हमेशा स्थूल, तार्किक ढंग से नहीं सोचता। संमोहन , स्वप्न, नशा कोटि का अपना तर्क एक अपनी दुनिया होती है। यह सोच माया नहीं होती, भ्रम नहीं होता, यथार्थ का ही वह गोपन पक्ष होता है, जो प्रत्यक्ष में छूट गया होता है। इसकी परिणिति पैरा-फिजिक्स में होती है, जो काल्पनिक समाधानों का विज्ञान है जो परम्परागत ज्ञान द्वारा प्राप्त समाधानों को खारिज करता है। प्रति तर्क, विपरीत मति ‌और बेतुकापन इसका मूलाधार है। इसकी भाथा पैराविनिटी की है जो परंपरागत ध्वनि और अर्थ को आर- पार कर रची जाती है। इसका पात्र स्वयं से ही प्रश्न करता है और स्वयं ही उत्तर देता है जो उसी तक सीमित भी रहता है- सत्यता और उपयोग दोनों में ही। इस पूरे परिदृश्य को सरयिलिज्म कहते हैं। जाहिर है कि यहाँ यथार्थ कहीं नहीं होता जो व्यक्ति बाह्य होता है, जो होता है वह व्यक्ति अंतर है। इसमे मनोविश्लेषण की अपनी भूमिका है। उसकी दो भूमिकाएँ गोचर होती हैं- एक रति की, दूसरी आत्मप्रदर्शन की। अतियथार्थवादी कविता में दोनो का निरुपण है।
शुद्ध कविता से तात्पर्य कविता की उस स्थिति से है , जिसमें वह भव्यता की ओर उन्मुख होती है और इस प्रक्रिया में सभी प्रकार के प्रदूषणों और गंदगियों से मुक्त होती है। यहाँ प्रदूषण और गंदगी से तात्पर्य कविता में दर्शन, राजनीति आदि पर दिए गए जोर से है । दूसरे वह सगीत की ओर मुखातिब होती है। उसमें कविता के कथ्य और उसके शब्दों का बेजोड़ सौंदर्य जिस बात में निहित होता है , वह होता है शब्दों की संवादी ध्वनियों और स्वरों की मधुरता का मेल। इस विचार को प्रतिपादित किया था अमेरिकन कवि एडगर एलेनयो ने और पुष्ट किया था फ्रासीसी कवि बादलेयर ने। आगे चलकर इसकी परणति सौंदर्यवाद की स्थापना में हुई।

सौन्दर्यवाद एक तरफ इन्द्रियों द्वारा ग्रहित वस्तुओं के रूप में सीमित माना गया तो दूसरी तरफ इसे ग्रहण करने वाले व्यक्तियों तक सीमित। कविता इन्हीं दोनों की बिना किसी मिलावट की अभिव्यक्ति मानी गई है। वस्तु नहीं, रुचि प्रमुख बन गई, जो वस्तु को देखने की, महसूस करने की एक विधा थी। इसने स्थापित किया कि हर कला आत्मपूरित होती है, आत्मपर्याप्त होती है, इसलिए उसे स्वयं अपने अलावा अन्य किसी उद्देश्य की ओर नहीं बहकना चाहिए। यानी कला -कविता-स्वयं अपने के अलावा अन्य किसी उद्देश्य की ओर नहीं बहकना चाहिए। उसे उपदेशात्मक, प्रार्थनात्मक, प्रचार प्रणीत या आचारवोधी बनने की कोई जरूरत नहीं। कला कला के लिए होती है और कविता कविता के लिए। कला और कविता का संबन्ध जीवन से जोड़ना बेकार है। इसलिए नैतिकता से भी उसका संबन्ध नहीं हो सकता । स्वयं जीवन को कला की तरह होना चाहिए। यानी कि कविता सीधे -सीधे जीवन का विकल्प है। जीवन को इतना आर्टीफिशल नहीं होना चाहिए जितना स्वयं (आर्ट )। इसका एक अर्थ यह भी है कि कविता में एक बिल्कुल नकली जीवन ( असली जीवन का उल्टा) रचा जाना चाहिए। इस कविता का मूल्यांकन भी कविताई से मिले किसी मानदंड से नहीं किया जाना चाहिए। कवि की भूमिका अपने आप में विशिष्ठ होती है। शायद यही मनोवैज्ञानिक कारण था कि कवि आधुनिक काल में "बोहेमियन" "नान-कन्फार्मिस्ट" के रूप में अपनी पहचान बनाया़। यह रुमानी आत्मवाद और आत्म-संस्कृति की देन की।

खैर सौन्दर्यवाद आगे बढ़कर उस काव्य -संगीत से जुड़ गया , उस सार से जुड़ गया, जिसे व्यक्त करने की इच्छा कवि की अपनी थी। मलार्मे, रिंबाबरलेन, वलेरी सभी ने इस तरह की शुद्धता की संभावना कविता में खोजी़। इसकी परिणति प्रतीकवाद में हुई। प्रतीक एक ऐसा मूर्त या अमूर्तवस्तु है, जो किसी अन्यवस्तु का प्रतिनिधित्व करता है या उसे व्यक्त करता है। उसकी पहचान व्यक्त में विशिष्ट की अर्धपारदर्शिता से होती है। वह रूपक से इस अर्थ में भिन्न होता है कि प्रतीक का अस्तित्व वास्तविक होता है, जबकि रूपक का चिह्न स्वेच्छाचारी बिचौलिए का होता है। यह संकेत से भी भिन्न होता है। संकेत तो जिस के बारे में कहा जा रहा है और जो कहा जा रहा है, उसमें एकता स्थापित करने को होता है। लेकिन प्रतीक में एक के भावमय से दूसरे बात की जाती है। अब शब्द स्वयं ही प्रतीक हैं, तो भी कविता में शब्द एक बिम्ब और अवधारणा को स्युक्त कर बनता है। ये व्यक्तिगत भी हो सकते हैं और सार्वजनिक भी। उनकी एक व्याख्या भी हो सकती है और अमूर्त भी। ये संरचनात्मक भी हो सकते हैं।सर्जनात्मक भी। उनकी व्याख्या भी हो सकती है और एक से अधिक भी। वे मूर्त को अमूर्त कर सकते है और अमूर्त को मूर्त । वे भावनाओं और विचारों को पहचानने के लिए प्रयुक्त हो सकते हैं, और उससे बचने के लिए भी हो सकते हैं। वे क्षणिक और मृत्य के बारे में हो सकते हैं तो प्रारंभिता के बारे में भी। हर प्रतीक का एक सहसंबन्धी होता है, जो कहीं घटनाओं की शृंखला के रूप में हो सकता है, तो कहीं स्थिति के रूप में हो सकता है। कहीं वस्तुओं के शृंखला के रूप में हो सकता है जो उस विशिष्ट संवेग की सूत्रवत पहचान कराये।

इसी से निकल कर इमैजिस्ट ग्रुप की कविताएँ आईं। यह ग्रुप मानता था कि कविता के लिए स्पष्ट और कठोर बिम्ब बहुत जरूरी होता है। इससे रचित बिम्ब विधान का मतलब है वस्तुओं , भावनाओं , विचारों, चिंतन, मनोस्थिति, कर्म कोई भी एन्द्रिक या या पराऐन्द्रिक अनुभूति की भाषाई अभिव्यक्ति , उसका भाषाई प्रतिनिधान, उसका मनव्यापि छवि होना जरूरी नहीं। वह शाब्दिक हो सकता है, अवधारणात्मक हो सकता है। दिग्दर्शित करने वाला हो सकता है। यूँ तो बहुत से बिम्बों का निर्माण आलंकरिक भाषा में होता है, लेकिन उसे रोजमर्रा की भाषा में भी आसानी से पाया जा सकता है। बिम्ब सभी पंच इन्द्रियों के होते हैं-स्वाद, गंध, रूप , स्पर्श, रंग , श्रवण सभी के। इसे अपनाने वाले कवि को आपनी कविता की विषय वस्तु के चुनाव के लिए स्वतंत्र रहना चाहिए और किसी भी विषय पर कविता लिखने में समर्थ होना चाहिए। हिन्दी में केदारनाथ अग्रवाल इनके अच्छे प्रयोक्ता थे। रूस में भी यह थोड़े दिन तक प्रचलन में रहा, जिसका प्रयोग कवि लोग शाक देने के लिए और हो हल्ला मचाने के लिए करते रहे।

इन सारी निर्मितियों में कल्पना की भूमिका बड़ी होती है, जो तर्क शक्ति को पार कर एक नई दुनिया रचती है। इसका जन्म प्रयत्न मति से होता है और यह अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है। वह ऐसे रूपों की सृष्टि करती है, जो वास्तविक जगत में नहीं मिलते। जो मिलते हैं उसका रूपान्तर कर देती है। हाब्स कहता है कि सब प्रकार का ज्ञान इन्द्रिय अनुभव से प्राप्त होता है। मन उन्हें बोध में बदल देता है। वस्तुओं के बिम्बों से स्मृतियाँ बनती हैं। उसी से एक तरफ विवेक , तो दूसरी तरफ कल्पना का सृजन होता है। विवेक से निर्णय उपजता है जो शक्ति और संरचना प्रदान करती है। कल्पना से कविता और उसका अलंकरण प्राप्त होता है। कल्पना वस्तिओं में और उनके बिम्बों में समरूपता तलाश करती है, जबकि विवेक उन्हें वर्गीकृत करता है, अलग -अलग करता है, अलग -अलग खानों में डालता है। विवेक कल्पना को बाधित करता है, उसे अनुशासित करता है। लाक कल्पना को " एसोसिएशन आफ आइडियास" में पाता है। एडिसन कहता है कि इसका अनुमान या अर्थसूचन उतना ही मत्वपूर्ण होता है, जितना सूचक उपलक्षण । पहले लैक फिर बादलेयर ने इसे कवि के अंभंयंतर के कूट संकेतों और प्रतीकों को निकूट करने के संसाधन के रूप में लिया , जो न केवल कविता को जन्म देती है , उसे अर्थ भी देती है। इसलिए कवि को विवेक सम्पन्न नहीं कल्पनाशील बनने की जरूरत है। यही मानवीय क्षमताओं का सम्मिलन करता है, उसे जादू बना देता है। कल्पना एक आभ्यन्तरित और शाश्वत भाषा है। जो देश और काल से उबर कर आती है, जो वस्तुओं के, बिम्बों के, भावनाओं के, सोच के, इच्छा के, मन की व्यथा के सम्मिलन को संभव बनाती है। यह चैतन्य लालसा का सहवर्ती है, संगठन कर्ता है, जो फैलाव देता है। कहीं अपव्यय भी करता है और विसर्जित भी करता है, पुनर्रचना के लिए।


शुद्ध कविता यानी प्रतीकवाद और अतियथार्थवाद ने संयक्तरूप से आलोचनात्मक यथार्थवाद को अपनाया और आलोनात्मक यथार्थवाद ने जादुई यथार्थवाद को।

कविता की इन रीतियों को समझने के लिए जरूरी है कि यथार्थवाद को भी थोड़ा समझ लिया जाए। इस दौर कविता के मूल्याँकन में बार बार आने वाला शब्द यथार्थ है। इसे यथा तथ्य से अलगाया जाता है। यथा तथ्य उसे कहते हैं जो है पर  बिना किसी गति की दिशा में। यानी उसमे गति तो है, पर उस गति की दिशा नहीं वह अराजक ढंग से आगे पीछे उपर नीचे कहीं भी जा सकता है। यथार्थ वह है जिसकी गति की दिशा है। यानी वह दिशा पूर्व निर्धारित है। उसे इतिहास से समझा जा सकता है। इतिहास की दो अवधारणाएँ हमारे समय में व्याप्त हैं। एक मानती है कि वह एक सीधी रेखा में एक निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ती जा रही है। कुछ विचारक कहते है कि वह लक्ष्य पूर्व प्रदत्त नहीं है, उसे हम जानबूझ कर निर्मित करते हैं। दूसरी अवधारणा यह है कि इतिहास की गति चक्रात्मक है। जो पहले हो चुका है वह फिर कभी न कभी जरूर होगा, भले ही उसका पहचाना जाने वाला रूप काल क्रम में काफी बदल गया हो.. वैसा हूबहू न हो। दूसरे कहते हैं कि वह अनुरूप या असल होती ही नहीं, बस हम अपनी इच्छा से खोज लेते हैं। जो भी हो , ये दिशाएँ अग्रगामी भी हो सकी हैं और पुरागामी भी। साहित्य का इन्हीं दिशाओं का खुलासा करने का होता है। जो साहित्य पुरागामी गति को लेकर लिखा जाता है उसे प्रतिक्रिया वादी कहते हैं। जो यथा तथ्य को लेकर लिखा जाता है उसे यथा स्थितिवादी कहते हैं। अग्रगामी के दो रूप हैं जो उपरोक्त दो इतिहास दृष्टि की देन है। जो चक्रात्मक ढंग वाले हैं वे खुलासा करते हैं कि जो आज है, वह पहले भी कभी था‌‌ ‌और जो आएगा ,वह पहले भी कभी आया था। यह बात और है कि आगे आने वाला हूबहू वैसा नहीं होगा, इस बीच मानवता जो अनुभव किया है उसकी भी स्पष्ट छाप उस पर होगी। जो सीधी लकीर में बढ़ते देखते हैं , उनमें मार्क्सवादी प्रमुख हैं, जो जगत को वर्गहीन समाज की ओर बढ़ते हुए देखते हैं और चाहते हैं कि इस समाज की स्थापना जल्द से ज्लद हो जाए। उसे बलात जल्द लाने के लिए सब कुछ को उसी के आधीन कर दिया जाना चाहिए। इन तमाम तरह की प्रतिछाया की चर्चा आधुनिक कविता में तरह तरह से हुई है। आलोचनात्मक यथार्थवाद ने मनोवैज्ञानक रूप से आदमी के भीतर क्रियारत गति या शक्ति का स्वतः रचनाकार के द्वारा प्रस्तुत खुलासे को देखना आँकना चाहा, जिसे सिर्फ प्राकृतिक या स्वाभाविक रूप से किसी बाहर के आदमी द्वारा देखा जाने पर संभव नहीं था। वास्तविकता यहाँ एक स्थिर प्रत्यक्ष न होकर एक मनोवैज्ञानिक गतिशीलता के रूप में लक्षित हुई जो सामाजिक गति को संकेतित करती लगी। रचना उसे ही चेतन प्रतिबद्धता के साथ वर्णित करने वाली बनी। रचनाकार ज्यों ज्यों चेतना के इस प्रवाह का इस्तेमाल ‌और गहराई और विस्तार से करते चले गए त्यों त्यों वह कामेक्षा और रति भूख की चर्चा में तब्दील होती गई। जहाँ यह नहीं हुई वहाँ अंतर का खोद बगोद जैसे गंदी नाली के कीड़ों का शास्त्र नता गया। दोनो ने ही कला को पतनशीलता में ढकेल दिया। इसने चेतन, अचेतन और अवचेतन के सीमा क्षेत्रों में एक तरह की बड़ी अव्यवस्था पैदा कर दी। जिसके परिणाम स्वरूप तमाम पतनोन्मुखी साहित्य रचा जाने लगा। उस पर कुछ कहने से पहले जरूरी है कि जादुई यथार्थवाद पर थोड़ी चर्चा कर लें।

जादुई यथार्थवाद ने क्रियेशनिज्म को जन्म दिया। वह कविता की एक अपनी शब्दावली बनाने पर जोर देता है। जिसमें चौंकाने वाले रूपक हों। उन्हें रचना में इस तरह से सटाकर रका जाए , जिससे कि वे स्वाभाविक लगने लगें। भाले ही वस्तु का कोई वास्तविक अस्तित्व न हो। जिससे अनुभूति की अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति के माध्यम की सीमा से बाहर निकल जाए, दूर निकल जाए। इसके लिए कवि रचना मे जुदा जुदा घटनाओं की संवृत्ति डालता है। समाज की भाषा की जगह व्यक्तिगत भाषा का प्रयोग करता है। यह अभिव्यक्ति वाद को जन्म देता है, जो मानता है कि अभिव्यक्ति ही रूप का निर्माण करती है। इसलिए कल्पना, बिम्ब योजना, विराम चिह्न, वाक्य विन्यास, सभी कुछ अभिव्यक्ति की वेदी पर बली चढ़ाए जा सकते हैं। इससे यथार्थ जादुई बनता है, और वह जादुई यथार्थ होता है, जो वास्तब में यथार्थ का विरोधी होता है वह आन्तरिक मनोवैज्ञानिक वास्तविकताओं का निर्माण करता है। इसमें दो छोर के कवि हमारे सामने आते हैं। एक ब्रेख्त हैं जो क्रान्ति की ओर उन्मुख हैं दूसरे बर्खेस और नेरुदा हैं जो " नेर्डसैट" की शब्दावली का रचना में प्रयोग करते हैं और क्रान्ति विमुख हैं।

कुछ कुछ इसी से जुड़ा हुआ और एक हद तक सायोनिज्मों है। इसका जन्म पुर्तगाल जैसे देशों में हुआ। इसमें विश्वदेवतावाद और पुर्तगाली भावनात्मक उत्कण्ठा को मिला कर एक रहस्यमयी राष्ट्रीयता का बोलबाला रचा गया, जो लोककथा, लोक स्मृति, लोकमिथ और पराकल्पना को समन्वित किए हुए थी। फर्निनांडो पेसोवा की "मेंसाजेम" संग्रह की कविताएँ इसका उत्तम उदाहरण हैं।

इन तमाम तरह की प्रवृत्तियों की परणति " एन्टी पोइट्री"( अकविता ) में हुई। उसे समझने से पहले यह नोट कर लेना जरूरी है कि कविता में जो नकारवादी प्रवृत्ति चली थी, उसका एक परिणाम "डाडावाद" था, जिसका मतलब एक साथ ही सब कुछ और कुछ भी नहीं था। इसके लिए परंपराओं का, नियमों का, आदर्शों का विरोध करता था। किन्तु इनकी परिणति नाचीजी में होती थी। बाद में इसी से कोलाज कविता , ठोस कविता , चित्र कविता आदि का जन्म हुआ, जिनमे शब्दों को यूँ ही यत्र तत्र बिना किसी व्यवस्था के सजाकर प्रभाव पैदा किया जाता था। आज भी पोस्टर कविता उसी का एक रूप है। ये आन्दोलन अन्ततः सरिस्यलिज्म से दबकर उसी में तिरोहित हो गए थे। लेकिन बाद में भेस बदल कर उन्होंने फिर सिर उठाया। वहीं " एंटी पोइट्री" बना। इसमें कविता का कोई प्लाट नहीं होता। उसे कहीं से भी उठाया जा सकता है और कहीं भी समाप्त किया जा सकता है। यह भी हो सकता है कि बार बार उठाया जाए और बार बार समाप्त कर दिया जाए। एक हीरचना के कई कई उठान हों और कई कई अन्त । चाहे चरित्रों का विकास न भी किया जाए, लेकिन वस्तुओं का सतह पर ही बड़ा विस्तृत वर्णन विवेचन किया जाए। उनका अपना स्लैंग, जारगौन , पैटिओस, मूल्यों के मानक कवि का अपना पहनावा , व्यवहार, नैतिक प्रचलन, मनोरंजन, रचनात्मक कार्यवाही सभी कुछ हो। यह कविता अपनी निर्मिति में पाठक को रचना से तारतम्य स्थापित करने में रोकती है। लेकिन उसी क्षण वह उसमें भाग लेने के लिए उकसाती भी है, रचना को बिना कोई ऐसी पारस्परिक भूमिका प्रदान किए।

अमेरिका की बीट कविता इसी से जुड़ी हुई है। माड, राकर, स्किन हेड, हिप्पी , पोस्टपंक, जाज पोइट्री , अडर ग्राउण्ड पोइट्री, आदि इसी के रूप हैं। ये ओकल्ड सिम्बालिज्म का प्रयोग करते हैं, लेकिन हर्मेटियन की जादुई शब्दावली का प्रयोग करते हैं जो कविता को अबुद्धिग्राह्य और कठिन बनाती है। जोर निजी भाषा और बिम्ब पर होता है और उम्मीद की जाती है कि उनकी ध्वनि ही कविता का अर्थ खोल देगी। वे कहते हैं कि कविता में सेंस नही संगीत की जरूरत है। एक बात यह भी है कि वह अगर "अंडरग्राउण्ड " है , तो उसमे जरूर कुछ गैर कानूनी है। उसमें कुछ छुपा कर की जा रहीं करनी, कुछ विनाश परक गतिविधियाँ शामिल हैं। वे परम्परागत जीवन को ध्वस्त कर उनकी जगह एक वैकल्पिक जीवन पद्धत्ति को रखती है। वहाँ के जीवन की परम्परा , श्रेणी बद्धता , बौद्धिकता , मध्यमवर्गीयता को नकार कर मुक्त यौनाचार और नशाखोरी ली सिर्फ रचना में संस्तति नही करते, बकायदा वही बोहेमियन जीवन जीते हैं। मन लगाते हैं तो जाज में , जेन बुद्धिज्म में, अमेरिकन इंडियन और मैक्सिकों के
" मेयोरकल्ट" में। ये दरअसल अराजकतावादी हैं। एक समय इन्होंने अपने लपेटे में रूस के येवतुशेंको और वोजनेसेन्स्त्री जैसे कवियों को भी ले लिया था। उसी से आज पाप संस्कृति निकली हुई है, जाज पोइट्री निकली हुई है, हाइपर रियालिज्म निकला हुआ है, जो उत्तर आधुनिकता का पर्याय है़

इन तमाम रीतियों ने उस साहित्य को जन्म दिया , जो मुख्य धारा के साहित्य से अलग रहा। इसलिए यह व्यवस्था के भी खिलाफ रहा। परंपरा से विरत रहा , कहिए विपरीत रहा। उपसंस्कृतियों और अपसंस्कृतियों के वेत्ताओ द्वारा रचित वैकल्पिक दुनिया का उन्नायक रहा। जाहिर है कि अपने इस स्वभाव के बावजूद यह क्रान्तिकारी नहीं रहा, क्योंकि यथार्थ को एक उद्देश्य की तरफ - चाहे वह सीधी रेखा वाले ढ़ंग का हो , या चक्रात्मक- बढ़ते हुए नहीं लखा। दरअसल बुर्जुआ जीवन की भौतिकता पर प्रतिक्रिया सिर्फ मार्क्सवादियों की ही नहीं हुई थी, शुद्ध कविता वादियों की भी हुई थी, जो एक वैकल्पिक जीवन खोज रहे थे। उन्होंने इसे अभौतिकता से ( अध्यात्मिकता से नहीं ) निगेट किया, जबकि मार्कवादियों ने भौतिकता से। उन्होंने माना कि कला और साहित्य राजनीतिक शक्ति प्रदान करने के साधन हैं। यदि नहीं हैं तो अब बना दिया जाना चाहिए।

भाग-२

हम कविता की एक और रीति पर आते हैं-- मार्क्सवादी कविता की रीति पऱ। इन्होंने कविता की सोच पर आधारित माना और सोच का आधार आदमी के यथार्थ से उत्पन्न अनुभव को माना। कविता को साहित्य का एक सीधा -सीधा अधिनस्थ उद्देश्य माना । क्रान्ति संभव करना और क्रान्ति हो जाने के बाद नव निर्माण में सहायक होना़। इसलिए इसे साधन माना- हथियार की हद तक एक साधन। इन्होंने अपने सिवाय समस्त कविता को अस्तित्ववाद के खाने में डाल दिया और अस्तित्व वाद को नीची निगाह से देखे जाने योग्य एक गलत दर्शन माना। जहाँ नहीं माना वहाँ सार्त्र का चश्मा पहन कर भविता ( being) और नाचीजी ( nothingness) दोनो पर एक साथ बात किया। अस्तित्व के दृष्टि कोण से कि आदमी अपने कर्म के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है और उसके होने का पता उसके कर्म से ही चलता है। यदि कर्म नहीं है तो अस्तित्व नही है, बस एक नाचीजी है।

इस कविता के तीन रूप जाहिर हुए। एक तो वह जो पार्टी के सत्ता में आ जाने के बाद , उसके समर्थन में लिखा जाने वाला था, जो समाज के नव निर्माण के लिए हो। यहाँ गौर करने की बात यह है कि जिस तरह से शुद्ध कविता और अतियथार्थवादी कविता तत्कालीन चित्रकला और संगीत की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर लिखी गई, उसी तरह मार्क्सवादी कविता आलोचना को ध्यान में रख कर। इस तरह कविता को आलोचना का बीज शब्द "समाजवादी यथार्थवादी " बनाया गया। कहा गया कि यथार्थवाद एक कला पद्धत्ति है, जो हर तरह से पूर्ण वस्तुगत , संज्ञानी और परवर्तनकाँक्षी कला स्वभाव है। वह वास्तविकता के साथ मानवीय व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का बहु आयामी संबन्ध लखाने वाला है, जो जीवन में तार्किक तथा विशिष्ट को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है। समाजवादी बन जाने पर वह सच्चे और ऐतिहासिक रूप में मूर्त्त सच्चाई का प्रतिबिम्ब मन जाता है, जिसे साम्यवादी सौन्दर्य - आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो जीवन के प्रगतिशील विकास का द्यौतक होता है। यह आलोचना दर्शन दरअसल उपन्यासों को मद्देनजर कर के विकसित किया गया था। कविता में, विशेष रूप से मुक्तक में उनकी संभावना कम थी। इसकी एक परिणिति फ्यूचरिज्म में हुई, जिसने माना कि आगे रचना को परम्परा से पूरी तरह से मुक्त करके लिखा जाना चाहिए। उसके लिए नए कथ्य , नए रूप , नई शैली , नई भाषा सामायोजित करनी चाहिए, जो इस यन्त्र -युग के अनुरूप हो। उन्होंने यन्त्र ,गति, गत्यात्मकता, युद्ध और देश प्रेम पर बल दिया। उन्होंने एक नई शब्दाबली " जौमी याचिक" का निर्माण किया। मुख्य धारा के मार्क्स वादी ने इसे जल्दी ठुकरा दिया, क्यों कि उन्हें लगा कि यह एकान्तर से मौजूदा नेतृत्व की आलोचना कर रहा है। बात गलत भी नहीं थी। क्यूबो फ्यूचरिज्म और दूगो फ्यूचरिज्म ने ऐसा ही किया ने ऐसा ही किया। क्यूबो फ्यूचरिज्म वालो ने, विशेषतः मायकोवस्की ने मूर्ति भंजन का काम किया। फिर चूँकि उन्होंने अर्थ की जगह ध्वनियों पर बल दिया, इसलिए वह मार्क्सवाद के काम वैसे भी न थी। इसी तरह अति व्यक्तिगत किस्म की कविताओं को लिखा जो लिखा जो स्वभाव से ही मार्क्सवाद के बर खिलाफ की । आगे आँवागार्द ने भी मार्क्सवाद का विरोध किया, फासीवाद को समर्थन देकर। ..........( क्रमशः)

 


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